रात कहर बन के आई,
चार घंटों में सब कुछ मिटाई।
जो शहर बसाए थे सपनों से,
अब रेत के महल गिराई।
सड़कें भर गईं पैरों से,
थकान के निशान लिए,
मीलों मील सफर पे निकले,
खाली पेट, अरमान लिए।
हवा में थी सन्नाटे की चीख,
राहों में था दर्द बिछा,
कोई बच्चा भूख से बिलखा,
कोई माँ लहू-लुहान हुई।
महल रोशनी में झिलमिलाए,
पर झोपड़ियाँ बुझ गईं,
सरकार के फ़रमान ने फिर,
लाशों की गिनती बढ़ा दीं।
कोरोना से लड़ने की देरी,
और लापरवाही थी भारी,
फिर तुगलकी फरमान चला,
मौत की घाटी में जनता उतारी।
हमने माँगा रोटी, पानी,
मिला डंडा, गालियाँ,
हमने माँगी राहत थोड़ी,
मिला मौत का रास्ता खाली।
पर देखो, इतिहास गवाह रहेगा,
ये जुल्म, ये भूख की मार,
हर क़दम जो हमने उठाया,
वो लिखेगा नई पुकार।
अब भूख नहीं, इंकलाब जलेगा,
अन्याय का ये अंधेरा ढहेगा,
हर हाथ में मशाल होगी,
हर आँख में नया सवेरा उगेगा!